मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

रथ पर राजनीति


लालकृष्ण आडवाणी की वर्तमान रथयात्रा, जिसे ‘जनचेतना यात्रा ’ नाम दिया गया है, का उद्देश्य अन्ना हजारे के अनशन से उठी जनचेतना का राजनीतिक लाभ लेने के साथ-साथ आडवाणी जी को पुनः भाजपा का सर्वमान्य  नेता के तौर पर स्थापित करना है। यह यात्रा अरुणाचल  प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम के साथ चुनावी राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब और गोवा से भी गुजरेगी। आडवाणी जी की यह सातवीं रथ यात्रा है। इससे पहले वे रामरथ यात्रा, जनादेश यात्रा, स्वर्ण जयंती यात्रा, भारत उदय यात्रा और भारत सुरक्षा यात्रा निकाल चुके हैं। भाजपा के महासचिव अनंत कुमार इस यात्रा के मुख्य समन्वयक हैं तथा कई दिग्गज भाजपा नेता मसलन रवि शंकर प्रसाद, मुरलीधर राव और पार्टी सचिव श्याम जाजू सह-समन्वयक की भूमिका में डटे हुए हैं।
तैयारी जोरों पर है। 11 अक्टूबर को शुरू हुई यह यात्रा 38 दिन तक चलेगी। कुल 18 राज्यों और 3 केन्द्रशासित प्रदेशों को कवर करेगी। बारह हजार किलोमीटर का सफर तय किया जायेगा। यात्रा सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक चलेगी। इस दौरान 250 से 300 किलोमीटर तक की दूरी तय की जायेगी। इस यात्रा के लिए रथ के तौर पर अत्याधुनिक बस का इस्तेमाल किया जाएगा। बस पुणे में तैयार की जा रही है। भाजपा सचिव श्याम जाजू के अनुसार बस में लिफ्ट, टेलीविजन,  कम्प्यूटर और लोगों को संबोधित करने की प्रणाली लैस होगी।
                     इन तैयारियों से तो यही लगता है कि आडवाणी जी ने पूरा रंग जमाने की तैयारी कर ली है। पर इस रंग में भंग तब पड़ जाता है, जब गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता नरेन्द्र मोदी पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में नहीं पहुंचते। इस अनुपस्थिति के कई निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे मोदी की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा से जोर कर देख रहे हैं, तो कुछ इसे मोदी की नाराजगी बता रहे हैं। गौरतलब है कि पिछले दिनों अपने उपवास के दौरान किसी बड़े भाजपा नेता के गुजरात न पहुँचने पर मोदी ने अपनी नाराजगी जताई थी। इस सारे झमेले से एक बात को स्पष्ट हो चुकी है कि आडवाणी अब भाजपा में सर्वमान्य नहीं रह गए हैं।
            आडवाणी वही व्यक्ति हैं, जिन्हें कुछ समय पहले तक भाजपा की रीढ  कहा जाता था। 1990 में सोमनाथ से अयोध्या तक राम मंदिर निर्माण के समर्थन में रामरथ यात्रा निकाल कर उन्होंने कट्टर
हिन्दूवादी राजनीति की शुरूआत की थी। इसी रथ पर सवार होकर भाजपा पहले उत्तर प्रदेश और बाद में केन्द्र में सत्ता में आयी। चार बार प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी का चेहरा अवश्य थे। मगर पार्टी के अंदर आडवाणी की ही तूती बोलती थी। उन्हें आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) का भी पूर्ण समर्थन हासिल था। इसकी वजह भी थी। दरअसल, इस पार्टी से उनका जुडाव तब से है, जब से एक विचार के रूप में इसकी शुरूआत हुई थी।
उनकी उपलब्धियां पार्टी में उनकी स्थिति का समर्थन करती है। मगर पिछले कुछ समय से आडवाणी अपनी कट्टर हिंदूवाद की छवि को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। इसके पीछे उनके निकटतम सहयोगी सुधीन्द्र कुलकर्णी का प्रभाव माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का एक तबका यह मानता है और कहता रहा है कि भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक , बहुधार्मिक देश में कोई धर्मनिरपेक्ष छवि वाला व्यक्ति ही सत्ता की बागडोर संभाल सकता है। अपनी छवि बदलने की कवायद आडवाणी ने पाकिस्तान यात्रा के समय ही कर दी थी, जब जिन्ना के मजार पर जाकर उन्होंने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में उनके योगदान को सराहा था। मगर तभी से वे आरएसएस के आंखों की किरकिरी भी बन गए।
वर्तमान रथयात्रा में इस भेद को महसूस किया जा सकता है। क्योंकि आरएसएस ने इसी शर्त पर इस रथयात्रा को सहयोग देना स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री के उम्मीदवारी  से इस यात्रा का कोई लेना देना नहीं है। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का स्पष्ट बयान आया कि लालकृष्ण  आडवाणी की यात्रा प्रधानमंत्री पद की होड़ के लिए नहीं है। बल्कि आडवाणी भारत में सुशासन लाने और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए यह यात्रा कर रहे हैं। यात्रा के संयोजक अनंत कुमार ने भी यह बयान दिया कि यह यात्रा ‘देश पहले’ की भावना को बढ़ाने के लिए है। स्वयं आडवाणी को भी इसकी पुष्टि करनी पड़ी। नागपुर में सरसंघचालक (आरएसएस) मोहन भागवत से मुलाकात के बाद ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि बीजेपी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद से बहुत अधिक दिया है।
भाजपा नेता के बयानों से तो यही लगता है कि आडवाणी प्रधानमंत्री की दावेदारी के लिए यह यात्रा नहीं कर रहे। मगर तथ्य कुछ और कहते हैं। यात्रा की शुरूआत पोरबंदर (गुजरात) से न करके सिताब दियरा (बिहार) से करने का कारन दरअसल, भाजपा के भीतर आडवाणी जी के आलोचकों का  मुंह बंद करने के साथ-साथ एनडीए के घटक दलों को भी यह संदेश देना है कि कभी कट्टरपंथी समझे जाने वाले आडवाणी अब सेक्यूलर छवि वाले नीतीश को भी स्वीकार्य हैं। सिताब दियरा लोक नायक जयप्रकाश नारायण का जन्म स्थान है वहीं यात्रा को हरी झंडी दिखाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार धर्मनिरपेक्ष चेहरा और भाजपा के सबसे बड़े सहयोगी दल के मुखिया। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी को राजग का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की कवायद के सख्त विरोधी जदयू के शीर्ष नेता नीतीश कुमार से आडवाणी की रथयात्रा को हरी झंडी दिखाने के गहरे राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। संभवतः यह पार्टी और जदयू को यह संकेत देने का प्रयास हो कि प्रधानमंत्री पद के विकल्प अभी खुले हैं।
मामला काफी नाटकीय होता जा रहा है। भविष्य में कई और राजनीतिक पैतरे आजमाए जाएंगे। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा अपनी अंदरूनी लड़ाई में फंसी रहती है या इससे उबरकर वर्तमान परिस्थितियों का लाभ उठा पाती है। फिलहाल तो इस उठा-पटक से यूपीए को ही फायदा हो रहा है।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

बॉलीवुड का बाजारभाव

पिछले दो दशक में बॉलीवुड का चाल; चरित्र और चलन काफी बदल गया है। यह महज संयोग नहीं कि बॉलीवुड में आया यह युगांतकारी बदलाव उस दौर में शुरू हुए जिसे उदारवाद का दौर बताया जाता है। 1990 -91 में आर्थिक मोर्चे पर शुरू हुए उदारवाद ने कुछ हद तक सांस्कृतिक माने जाने वाले सिनेमा की सीमाओं को खोलकर उसे एक नए दौर में पहुंचा दिया। ये दौर बाजार का दौर था। तकनीक और बाजार के मिले जुले सहयोग से हिंदी सिनेमा ग्लोबल हो गया। पुराने थियेटर एक के बाद एक बंद होने लगे।
देशी ललनाओं को लूटने वाले अप्रवासी नायक इस दौर में फिनोमिना बन गए। 1995 में चोपड़ा कैंप की शाहरूख - काजोल अभिनीत दिल वाले ‘दुल्हनिया ले जाएंगे‘ फिल्म आई। इसके बाद ऐसी फिल्मों की बहार आ गई। शाहरुख के सुपर स्टार बनने में ऐसी फिल्मों ने महती भूमिका निभाई। यह महज संयोग नहीं है कि शाहरूख हिंदुस्तान जितने ही बाहर भी लोकप्रिय हैं। इसी दौर में महानगरों में ही नहीं; मझोले शहरों तक में बड़ी संख्या में मल्टीप्लेक्स खुलने लगे। इसी वक्त ढ़ाई करोड़ एनआरआई और मल्टीप्लेक्स के देशी दर्शकों के साथ सिनेमा का एक नया कंज्यूमर क्लास सामने आया जिसके पास खर्च करने के लिए बहुत कुछ है। परंतु इसी काल खंड के दौरान टीवी दूरदर्शन के महाभारत और चित्रहार के सीखचों से बाहर निकलकर निजी चैनलों की जद में पहुंच गया। इससे थोड़ा बाद में ही इंटरनेट का भी उभार हुआ। इन माध्यमों के कंज्यूमर भी ज्यादातर यही वर्ग हैं। फलत: मनोरंजन के साधन के तौर पर सिनेमा को जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा से गुजरना पड़ रहा है। हालांकि कई बार ये माध्यम सिनेमा के विरोधी नहीं पूरक की भूमिकाओं में भी नजर आते हैं।
इसका परिणाम पिछले कुछ समय से प्रचार के नए-नए हथकडों के रूप में सामने आया है। तकरीबन साल भर पहले ‘गजनी‘ के प्रदर्शन से पहले पिछली दिवाली पर एक मल्टीप्लेक्स के सभी कर्मचारी एक ही हेयर स्टाइल में नजर आए। मौका भी ऐसा चुना गया जिसने सोने पे सुहागा का काम किया। आमिर खान के प्रतिद्वंदी के रूप में जाने जाने वाले “ााहरुख खान अभिनित ‘रब ने बना दी जोड़ी‘ का पहला “ाो उसी मल्टीप्लेक्स में चल रहा था। मीडिया को मसाला मिला और ‘गजनी‘ को पब्लीसिटी।
इस एक हेयर स्टाइल को ऐसा सिबांलिक रूप दिया गया कि उसने ‘गजनी‘ को 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई करा दी। इससे पहले शाहरुख खान की ‘रब ने बना दी जोड़ी‘ के प्रमोशन में भी सारा घ्यान एक गाने पर रखा गया और शाहरुख के लुक पर जिसमें वे मूंछों वाले एक आम मिडिल क्लास आदमी नजर आ रहे हैं। 'थ्री इडियटस’ के प्रमोशन में तीन आदमी कैमरे की तरफ पीठ किए कमोड पर बैठे नजर आते हैं जबकि फिल्म का मुख्य थीम कुछ और हैं। जाहिर है कि इस तरह के प्रयोग अधिक से अधिक व्यूअर को मल्टीप्लेक्सों तक खींच कर लाने के लिए किए जा रहे हैं। ये एक अलग तरह का चिन्हशास्त्र है; जिसमें चिन्हों को ब्रांड में बदलकर अपने उत्पाद को बेचने की कोशिश की गई है।
ब्रांड वैल्यू के वर्तमान दौर में सही- गलत के पैमाने को संकुचित मान कूड़ेदान में फेंक दिया गया है। इसलिए यह जायज ही कहा जाएगा कि चाहे मांग के हिसाब से उत्पाद पैदा की जाए या उत्पाद के हिसाब से मांग पैदा की जाए; मूल चीज धन की प्राप्ति है। जब प्रचार तंत्र की बात कर रहे हैं तो एक और माध्यम है। वह है रियलिटी शो और सिनेमा का सह संबंध। एक वह समय था जब यह बात फैल रही थी कि टीवी का बढ़ता प्रचलन क्या सिनेमा को खत्म कर देगा? बढ़ती प्रतिस्पर्धा में क्या सिनेमा अधिक सुलभ और ज्यादा वास्तविक टीवी के सामने टिक सकेगा? मगर देखिए दोनों एक दूसरे के मार्केट में दखल देने के बजाए एक दूसरे का मार्केट बढ़ाने का काम कर रहे हैं। सलमान खान द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले रियलिटी शो में एक तरफ सारे बड़े बॉलीवुड स्टार अपनी फिल्मों का प्रचार करते हैं वहीं इन स्टारों की उपस्थिति से टीवी सीरियल की टीआरपी भी बढ़ जाती है। यह बात ’लिटिल चैंप्स’ पर भी लागू होती है और ‘तेरे मेरे बीच में‘ पर भी।
शुद्ध मुनाफे का यह अर्थशास्त्र स्वस्थ मनोरंजन को कितना और कब तक सहारा दे पाएगा; कहना मुश्किल है। अच्छी फिल्मों को जरूरत से ज्यादा प्रचार की जरूरत नहीं पड़ती। वैसे भी बॉलीवुड फिल्मों में सफलता का औसत 30 प्रतिशत से अधिक नहीं है। ऐसे में फिल्म उद्योग को ऐसे बेहिसाब खर्च करने पर नुकसान उठाना पड़ेगा। सब कुछ को ब्रांड में बदल देना उचित नहीं है। कला में कलात्मकता ही उसे हृदय तक पहुंचाती है। राम गोपाल वर्मा की ‘आग‘ या वार्नर ब्रदर की ‘चांदनी चौक टू चाइना‘ का बॉक्स ऑफिस कलेक्सन से ज्यादा अच्छा उदाहरण इसका क्या हो सकता है।
'अमर उजाला' में प्रकाशित

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

राम तारणहार या तोरणहार

लोकसभा में जिस लिब्रहान रिर्पोट ने संसद को कई दिनों तक गर्म रखा वो संसद से बाहर निकलते हीं खो गयी। जिस उम्मीद से यह रिपोर्ट लीक की गई थी; उसमें आंशिक सफलता भी न पा सकी। विद्वानों ने राय दी कि यह मुद्दा मर चुका है। दरअसल इसे तो मरना ही था। आखिर यह महज चुनावी मुद्दा जो ठहरा। एक दिन ऐसा आएगा; यह तो तभी लग गया था जब स्वयं अयोध्या में रहने वाले अधिकांष लोगों ने शुरू से ही राममंदिर आंदोलन का विरोध किया था। उनका विश्वास था कि राम सौहार्द और मर्यादारक्षक के प्रतीक हैं हिंसा और अलगाव के नहीं।

दरअसल राम की छवि एक धनुर्धारी योद्धा की है। जो उनके मर्यादा पुरुषोत्तम रूप पर भारी पड़ती है; जबकि कृष्ण की छवि मुरलीधारी माखनचोर बालगोपाल की है जो कि उनके कुटिल नीतिकार के चरित्र को ढ़क देती है। भारत के अधिकांश घरों में कृष्ण की पूजा की जाती है जबकि राम कुछ हजार अशोक सिंघलों की राजनीति के हथियार भर बन के रह गए हैं।

देखा जाए तो पिछले दो दशक में एक औसत भारतीय और अधिक धार्मिक हो गया है। बहुत कम लोग हैं जो खुले तौर पर यह स्वीकार कर सकें कि वे धर्म को नहीं मानते हैं। अतः अब धर्म को लेकर उठने वाले सवालों में भी परिवर्तन आया है। धर्मनिरपेक्ष होने से ज्यादा धर्म के स्वरूप पर विचार की जरूरत है। वैसे भी भारत में धर्मनिरक्षता का मतलब धर्म से इतर न होकर सर्वधर्मसमभाव ही माना जाता रहा है और भारतीय समाज को देखते हुए यही उपयुक्त भी लगता है। आधुनिकता की शुरूआत में ही धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय माना गया था। शुरूआत में इस पहल ने आश्चर्यजनक रूप से अलग अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान की जगह संपूर्ण भारतीयता के दायरे में बहुलतावादी समाज की नींव रखी थी। सुदूर दक्षिण से लेकर बलूच कबीलों तक भारत का स्वप्न देखा गया।

आजादी के बाद जो भी टूटा-फूटा भारत बना उसने भरसक खुद को संवारने की कोषिष की। चालीस वर्षों तक उसने विभिन्न खट्टे मीठे अनुभवों से गुजरते हुए एक राष्ट्र के रूप में विकास करता रहा। परंतु नब्बे के दषक के कुछ ऐसे विभेदकारी परिर्वतन लाए; जिसने इस पहले से ही फटे चादर की मरम्मत को थोड़ा और कठिन बना दिया। नरसिंह राव की सरकार ने जिस आर्थिक उदारवाद को अपनाया उसने आर्थिक उन्नति तो दी; परंतु सामाजिक परिस्थितियों को काफी बदल दिया। जो समाज अभी तक सामंतवादी परंपरा की जकड़न को तोड़ न पाया हो; उसमें उत्तर - आधुनिक जीवन मूल्य ठूंसे जाने लगे। इस स्थिति ने एक कन्फ्यूज वर्ग को पैदा किया।

यह महज संयोग से कुछ ज्यादा है कि उदारवाद और कमंडलवाद लगभग एक साथ उभरे। ऐसा अकारण नहीं हुआ। दरअसल बाजारवाद ने जिस अंधाधुंध शहरीकरण को मजबूरी बना दिया; उसने परिवार के आकार को छोटा कर दिया। व्यक्ति अत्यधिक व्यस्त और अकेला होता गया। अपनी परंपराओं और संस्कृति से इतर एक उधार की संस्कृति के पीछे भागता शहरी मध्यवर्ग। इस स्थिति ने एक तरह की टूटन पैदा की है और एक तरह की आंतरिक ष्षून्यता। ऐसे अतिव्यस्त; नाराज और निराश समाज तक अपनी बात पहुंचाने और उन्हें आकर्षित करने के लिए किसी ऐसे प्रतीक की आवष्यकता थी; जिससे न तो वे नाराज हो सकें और न हीं निराष।

ऐसे में ‘रामायण‘ और ‘महाभारत‘ जैसे महाकाव्य न केवल राजनीति के बल्कि बाजार के भी सबसे आसान और सबसे कारगर हथियार बनकर उभरे। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ ही इसलिए क्योंकि ये भारतीय समाज की जातीय स्मृति को झकझोरने की विराट ताकत रखते हैं। उनमें मनुष्य अपना इतिहास देखता है जो आधुनिक इतिहास से भिन्न लोकप्रिय इतिहास है।

पिछले दशकों का निर्णायक तत्व यही व्यवसायिक जातीय वृत्तांत है; जिसका नायक एक नया प्रतीक राम है। यही राम राजनीति और व्यवसाय दोनों के सबसे बड़े ब्रांड भी हैं और उत्पाद भी। यही वजह है कि यह नया प्रतीकात्मक ‘राम‘ समाज का पीछा नहीं छोड़ रहा। मगर जैसे काठ की हांडी दोबारा आग पर नहीं चढ़ती; वैसे ही समाज को एक ही झुनझुने से बार-बार नहीं बहलाया जा सकता। इस बहुलतावादी समाज में सबकुछ को पचा लेने की विराट क्षमता है। वह समझ चुकी है कि धर्म का संबंध आस्था से और राजनीति का व्यवहारिक जरूरतों से। दोनों का घालमेल सिर्फ नुकसान ही दे सकता है।

बुधवार, 20 जनवरी 2010

सचमुच ऐसा हुआ.

आज एक अजीब वाकया हुआ। साधारण रूप में अख़बार में छपने का मौका कोई नही छोड़ता , परन्तु मेरा अनुभव अलग रहा। आजकल मैं विभिन्न लोगों के इंटरव्यू लेकर कौलम रूप में लिखता हूँ। यह एक नया चलन है। इसी सन्दर्भ में आज एक पुलिस अधिकारी से मिला तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया।
उनका कहना था कि मेरा अनुभव इतना छोटा और 'टुच्चा सा' (सचमुच यही शब्द बोला था ) नही है जिसे आप यूँहीं आधे घंटे में निपटा दें। पहले समय लेकर आइये ,सिलसिलेवार सवाल बनाकर लाइए- फिर बात होगी। यह सुनकर जब मैं चलने को हुआ तो एकाएक अधिकारी साहब ने पैतरा बदला और माथे पर पसीने का अहसास दिलाते हुए कहने लगे मेरी तबियत ठीक नहीं है आप दो दिन बाद आइए फिर बात करेंगे। मानो अख़बार मेरे बाप कि जागीर हो। बुरा तो जरुर लगा पर जल्द ही यह अहसास हो गया कि अधिकारी साहब डरे हुए हैं।
एकाएक अनजान पत्रकारनुमा शख्श से सामना होने की उम्मीद नहीं रही होगी। हालाँकि मै तो साधारण बातें करने गया था, पर ये उन्हें कहाँ पता ? वो बेचारे इस सोंच मरे जा रहे थे कि पता नही यह टुच्चा आदमी क्या पूछ ले। तो भइया ये थी आज की रामकहानी .आगे फिर कभी।

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

जब एक भाषा मरती है



जब एक भाषा का मरती है तो मानवीय अनुभवों की पूरी एक परंपरा मर जाती है। अपने अन्दर अनगिनत ज्ञान का भंडार लिए ये भाषाएँ मानवीय इतिहास की थाती हैं। कई ऐसी भाषाएँ मर चुकी हैं,जिनकी उपयोगिता शायद मानव जीवन को बचाए रखने के लिए आवश्यक थी।
कई ऐसे आदिवासी समूह हैं जिनमें प्रकृति से संतुलन बनाये रखने की गजब की काबीलियत है। आज जब हमारे जीवन जीने का तरीका ही हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाश का सामान तैयार कर रही हैं तो यह मज़बूरी बनती जा रही है कि हम अपने इस उपभोग आधारित जीवन शैली पर पुनर्विचार करें। ऐसे में जब विकल्पों पर विचार किया जायेगा तो इन आदिवासी समूहों के अनुभवों की जरुरत महसूस होगी।
हमें कतई यह हक़ नहीं पहुँचता कि हम इन अनुभवों को मिटा दें। ये आने वाली उन पीढ़ियों के काम आएगी जिनके सामने हम एक असुविधाजनक विश्व छोड़ कर जाएगें। मैं नहीं समझता कि मेरी बातें ज्यदा कठोड़ हैं, और न ही यह समझौतावादी मानसिकता कि पैदाइस है। दरअसल समस्या बड़ी है और उसके लिए किये जाने वाले उपाए टाट पर पैबंद लगाने सरीखे । समस्या हमारे जीवन जीने के तरीके में है। जरुरत से ज्यादा प्रकृति का दोहन निश्चय ही घातक है।
महात्मा गाँधी ने संयम और संतोष में मानवता का विकाश का माना था। उनका नजरिया प्रकृति से साहचर्य बना कर चलने की थी। जबकि हमने पश्चिमी उपभोक्तावाद का रास्ता चुना । शायद आने वाला इतिहास हमें इस भूल का अहसास दिलाय। इसलिए जरुरत जो है उसे संजो कर रखने की है।
अकेले अमेरिका में पिछले सौ सालों में सैकड़ों भाषाएँ ख्त्म हो चुकी हैं। कुछ को बोलने वाले बमुश्किल पचास या सौ लोग हैं। जरुरत इनको बचाने की है।अमेरिका में बसी यूरोपीय जातियों ने स्थानीय संस्कृति को मिटाने के लिए बड़ी निर्ममता से वहां की बोलियों को खत्म किया। यह सिलसिला अभी भी जारी है। लगभग यही हाल आस्ट्रेलिया का है। हमारे यहाँ भी स्थिति ज्यादा अलग नही है। पिछले कुछ समय से जिस तरह आदिवासियों को जंगलों से बेदखल किया जा रह है। जबरदस्ती उन पर बहुसंख्यक आबादी की जीवन शैली थोपी जा रही है। इससे बहुलतावादी , बहुसांस्कृतिक और बहुभाषीय समाज का न केवल ताना बाना बिगड़ेगा , बल्कि इनके साथ बहुत सी परम्पराएँ , अनुशंधान, उपचार और अनुभव का भी अंत हो जाएगा ।
इस बहुरंगी प्रकृति की संरचना इसकी विविधता पर आधारित है। जीवों और पौधों की पूरी एक माला है जो कि एक दूसरे से गुंथी हुई है। इनमे एक का भी टूटना पूरी माला को तोड़ देगा। जाहिर हर मोती की हिफाज़त जरुरी है।